chacha ne gandi galiyon dekar mujhe choda

चाचा ने मुझे गन्दी गन्दी गालियाँ देकर चोदा

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मैं छत पर बैठी हुई अपने ख्यालों में डूबी हुई थी। मुझे अपनी कक्षा में कोई भी लड़का अच्छा नहीं लगता था और ना ही कोई लड़का मेरी ओर देखता ही था।



गन्दी कहानी मुझे वास्तविक नहीं लगती थी। कभी देवर अपनी भाभी को चोद रहा है तो कभी चाची की चुदाई हो रही है।

नौकरानियाँ भी अकसर चुदती रहती हैं। लड़के आपस में गुदा मारते-मराते हैं, समधन को समधी ने चोद डाला या फिर अपने दामाद से ही चुदवा लिया। पर यहाँ तो ना मुझे कोई देखता है और ना ही मुझे कोई ऐसा लगा कि मैं जिससे चुदा सकूँ।

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शायद इसी भावना के रहते मैंने कभी चुदाई की तरफ़ ध्यान नहीं दिया। मैं बार बार अपनी उभरी हुई चूचियों को निहारती, उन्हें दबाती भी, पर मुझे कोई भी सिरहन सी नहीं होती है। चूत को सहलाने से भी ऐसी कोई चुदवाने की इच्छा भी बलवती नहीं होती है।



हुंह ! यह सब बकवास है …… मात्र समय बरबाद करने का एक तरीका है।



फिर भी लड़कियाँ चुदती तो हैं ना !



उंह ! भला क्या मजा आता होगा।



“क्या बात है …… कहाँ खोई हो……?” चाचा ने मेरी कुर्सी को पीछे शरारत से झुला दिया।



“ओह चाचा …… कुछ नहीं बस यूँ ही…… ईईई …… मत करो ना, मैं गिर जाऊँगी !” मैं घबरा कर बोल उठी।



कुर्सी को सीधे रखते हुये वो मुझे नीचे से ऊपर तक निहार कर बोले,”आज तो बहुत सुन्दर लग रही हो?”



“चाचा …… आप भी ना …… मुझे क्या छेड़ रहे हैं ?”



“अरे नहीं, सच में …… !”



मैंने चाचा को घूर कर देखा और जाने क्या मन में आया और फिर एक तीर मारा,”चाचा, डेशिंग तो आप लग रहे हो …… देखो क्या सेक्सी हो?” उनके पजामे के ऊपर से ही उनके कूल्हों पर एक हाथ मारा।



मैंने सोचा आज चाचा को आजमा कर देखते हैं, ऐसा-वैसा कुछ होता है या नहीं।



“सच मालती, यह उमर ही सेक्सी होती है …… अपने आप को देख …… ऐसा फ़िगर …… क्या मस्त है।”

उनके कहते ही मुझे एकदम जैसे सिरहन सी हुई।



मैंने चाचा की तरफ़ देखा …… तो उनके चेहरे पर शरारत भरी मुस्कान थी।

अरे बाबा ! यह तो लाईन मार रहा है।



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“चाचा, लगता है आपकी अब शादी कर देनी चाहिये …… अब आपको सभी लड़कियाँ मस्त लगने लगी हैं !”



“शादी की क्या आवश्यकता है …… मस्ती तो बिना शादी के भी की जा सकती है !”



“वो कैसे भला ?” मुझे भी अब शरारत सूझने लगी थी। शायद मजाक ही मजाक में काम बन जाये।

तभी चाचा ने मेरे चूतड़ दबा दिए।



मुझ पर जैसे बिजली सी कड़क गई। अब मुझे लगा कि सच में यह खेल तो बड़ा ही मज़ा भरा है। मैं जैसे किसी अनजान तड़प से उछल पड़ी। यह इतना मज़ा कैसे आ गया राम !

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“चाचा एक बार और दबा दो ना ……” मेरे मुख से अपने आप ही निकल पड़ा।



चाचा को तो जैसे हरी झण्डी मिल गई हो …… वो मेरे पीछे आ गये और मेरे दोनों चूतड़ों के मस्त उभार सहलाते हुये दबाने लगे। मेरी चूत में फ़ुरफ़ुरी सी होने लगी। मज़ा से मेरी आँखें बन्द होने लगी। आह तो ये मज़ा आता है !

इसका मतलब यह है कि मर्द के हाथों में जादू होता है।



“बस करो …… अब और नहीं…… तुम्हारे हाथों में तो जादू है।”



पर सुनता कौन है, देर हो चुकी थी। तीर हाथ से निकल चुका था। उसने अब हाथ आगे बढ़ा कर मेरी चूचियों को दबा लिया था। मेरा शरीर



मीठी सी गुदगुदी से कसमसा उठा। मुझे यह क्या क्या होने लगा था।



“बस अब छोड़ दो चाचा …… ” मैं कसमसाई।



“कैसा लग रहा है मन्जू…… ” जैसे कहीं दूर से आवाज आई।



“हाय रे …… बस करते ही जाओ …… चाहे चोद डालो !” अन्तरवासना की भाषा मुख से निकल पड़ी।



“धीरे धीरे आगे बढ़ेंगे …… एक दम से चुदाई नहीं …… जवानी का मजा तो लो !”



“सच राजा …… मुझे नहीं मालूम था …… कि ऐसे करने से दिल में तड़प सी होने लगती है …… मसल डालो मेरी चूचियों को !” मुझे अपनी सारी सोच किसी कूड़े दान में जाती नजर आने लगी।



“बड़ी मस्त भाषा बोलती हो ……तेरी भेन दी फ़ुद्दी …… जब लौंडा से चुदोगी तो चूत में स्वर्ग नजर आयेगा।”

“आह, तेरा लौड़ा है या मज़ा की खान …… ला मुझे हाथ में दे दे …… साले को मसल डालूं !” अन्तरवासना के मधुर डॉयलोग मेरी जबान से शहद बन कर टपक रहे थे।



उसने मुझे कस कर चिपका लिया और उसके अधर मेरे गालों तक पहुँच गये थे। रात का धुंधलका बढ़ रहा था। मुझे भी वासना भरी मस्ती चढ चुकी थी। चाचा के रूप में मुझे मस्त, हट्टा-कट्टा जवान मिल गया था, उसका लौंडा जैसे ही हाथ में आया, मुझे लगा कि सारा जमाना मेरी मुट्ठी में है। उसे चाहे जैसे मरोड़ दूँ, चाहे जैसे घुमा दूँ।



“चाचा, चल नीचे जमीन पर लेटा कर मुझे रगड़ दे …… चाहे तो मेरी फ़ुद्दी मार दे !”



“नहीं, तेरे गद्दे पर लेट कर मजा लेंगे …… उछल उछल कर चुदाई करेंगे।”



“हाय रब्बा, कैसा बोलता है रे तू …… अभी तो रगड़ दे …… देख कैसी तड़प उठ रही है।”



हम दोनों एक दीवार के कोने में चिपके हुये लेट गये। वो मेरे ऊपर चढ़ गया और मुझे दबा डाला। मुझे उसका भार भी फ़ूल जैसा हल्का लगा। मेरी चूचियाँ उसने दबा डाली और मेरे मुख पर उसने चुम्बनों की बरसात कर दी। उसके लौंडा का कड़ापन मेरी चूत को रगड़ने लगा। मुझे पहली बार बूब्स दबवाने में इतना कामुक मजा आया था। उसके खुशबूदार चुम्बन मुझे उसके गाल जीभ से चाट चाट कर उसे गीला कर देना चाहते थे।



हाय रे ! शहद से भी मीठा, मेरा चाचा !



“चाचा, बस चोद दे अब, नहीं रहा जाता है …… घुसा दे लौड़ा …… आह !!”



मैंने अपनी जींस नीचे सरका दी। चाचा ने भी अपनी जींस उतार दी। जल्दी से हमने अपनी अपनी चड्डियाँ उतार दी और चुदाई के लिये तैयार हो गये।



“जल्दी घुसा डाल, राजा …… जल्दी वार कर ना !”

मैंने अपने दोनों पांव ऊपर उठा लिये। उसने लौंडा मेरी चूत के द्वार पर रख कर दबाव डाला तो सीधा अन्दर उतर गया। मुझे तेज मीठी सी गुदगुदी हुई और लौंडा पूरा चूत में समा गया। जैसे ही अन्दर-बाहर लौंडा ने चाल पकड़ी, मुझे मालूम हो गया कि गन्दी कहानी में लिखी एक एक बात सही है। पर मेरी झिल्ली का क्या हुआ …… वो तो फ़टी ही नहीं …… कुछ पता ही नहीं चला ! कोई दर्द ही नहीं हुआ। बस मज़ा ही मज़ा …… मस्ती ही मस्ती …… मैंने चाचा को जकड़ लिया और मस्ती से चुदाई में लग गई। दोनों ओर से कमर तेजी से चल रही थी।



तभी मैंने पलटी मार कर चाचा को नीचे दबा लिया। जाने मुझमें कहाँ से इतनी ताकत आ गई कि मैंने उसका खड़ा लौड़ा देख कर अपनी गुदा का छेद उस पर दबा दिया। अन्तर्वासना में गुदा चुदवाने के बारे में भी तो लिखा है। मन में आया कि सब कुछ करके देख लूँ।

तो चल रे मादरचोद लौड़े, अब गुदा में घुस जा।



मुझे कोई अधिक महनत नहीं करनी पड़ी। जो दबा कर गुदा पर जोर लगाया तो एक बार चाचा ही चीख पड़ा।



“अरे चुप ना, साले मरवायेगा, गुदा नहीं मारनी आती है क्या?”



“अरे लगती है यार, तुझे नहीं लगती है?”

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उसकी बातें मुझे आश्चर्य में डाल रही थी। मुझे क्यूँ लगेगी भला। उसका लौंडा मेरी गुदा में सरलता से सरकता चला गया। पर चाचा था कि दर्द से मरा जा रहा था। मैंने ऊपर से दो तीन मस्त धक्के लगाये तो मुझे अब कुछ दर्द हुआ।



उह ! मुझे तो गुदा में मजा नहीं आता है। मैंने कुछ ही देर में बाहर निकाल दिया और उसे अपनी चूत में घुसेड़ लिया। आह ! दिल में एक ठण्डक सी हुई। लौंडा अब सरलता से मेरी चूत में घुसा हुआ अलौकिक मज़ा दे रहा था।



चाचा को तो जैसे सांस में सांस आई। उस दिन मैंने चाचा को खूब मस्ती से चोदा और दिल की सारी हसरतें निकाल ली। फिर उसका गर्म-गर्म वीर्य मेरी चूत की गहराइयों में उगलने लगा। मुझे एक मस्ती का सा अहसास हुआ उसके झड़ने से। फिर मेरी चूत में से निकलता हुआ उसका गर्म-गर्म वीर्य, उसके पेडू को गीला करने लगा था।



मेरे मात्र एक दो तेज झटकों ने मेरा काम भी पूरा दिया। मैं भी झड़ने लगी।

शायद मुझे जिन्दगी में पहली बार झड़ने से ऐसा लगा कि मैंने मूत दिया हो।

काफ़ी सा पानी निकला मेरी चूत में से।



मैं झट से सीधे खड़ी हो गई। मेरी चूत में से गीलापन नीचे टपकता रहा। नीचे से चाचा निकल कर जल्दी से खड़ा हो गया और अपना लौंडा देखने लगा। शायद उसे कोई चोट लगी थी। पर नही ! सब ठीक था। हाँ, उसकी पीठ पर जमीन की रगड़ से खरोंचे जरूर पड़ गई थी। उसकी पीठ जमीन की धूल से भर गई थी। उसने अपना पजामा लेकर मेरे पीठ की धूल भी साफ़ कर दी थी।



“चाचा, मजा आ गया ना?”



“हुंह, साली ने मुझे रगड़ दिया, ऐसे भी कोई करता है क्या !”



“अरे चाचा, यार इसमें मजा तो बहुत आता है, अब तो रोज ही रगड़म-पट्टी करेंगे।”



चाचा मुझे देखे जा रहा था। शायद वो मेरी बात समझ नहीं पा रहा था। पर मुझे वो अनोखा अनुभव मिल चुका था जिसके लिये लड़के और लड़कियाँ दीवाने रहते हैं और जिनकी कृपा से गन्दीकहानी.इन की मदद से अपने दिल में आग लगा लेते हैं।

यह दुनिया में बस एक ही सत्य वचन है …… यह अनोखा मज़ा !

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